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जड़ता से ग्रस्‍त सोच का नतीजा है स्‍त्री-विरोधी बयानबाजी

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जड़ता से ग्रस्‍त सोच का नतीजा है स्‍त्री-विरोधी बयानबाजी
हाल ही में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने यौन हिंसा पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “रेप की घटनाएं भारत में कम इंडिया में ज्यादा होती हैं, क्योंकि वहां विदेशी सभ्यता का असर ज्यादा दिखाई देता है, आप देश के गांवों और जंगलों में देखें जहां कोई सामूहिक बलात्कार या यौन अपराध की घटनाएं नहीं होतीं। यह शहरी इलाकों में होते हैं। मोहन भागवत के इस बयान पर उनकी तीखी आलोचना हुई, जो कि स्‍वाभाविक ही थी क्‍योंकि अपराधी,  खास कर यौन हिंसा के मामले में, शहरी अथवा ग्रामीण परिवेश को देखते हुए अंजाम नहीं देता। इस मामले में सबसे गौर करने वाली बात यह है कि जिस दौरान दिल्‍ली में दामिनी कांड हुआ, उसके बाद पूरे देश से बलात्‍कार की अनगिनत खबरें आयीं, जिनमें से आधी से अधिक ग्रामीण इलाकों से थीं। क्‍योंकि हमने दिल्‍ली की घटना पर ही ज्‍यादा चर्चा की और बाकी को नजर अंदाज किया, इसलिए कोई कह सकता है कि यह दिल्‍ली में ही होता है। यह किसी घटना पर आंख मूंदकर अपने पूर्वग्रहों के आधार पर दी जाने वाली प्रतिक्रिया है।
अरुंधति राय समेत कई लोगों ने यह सवाल उठाया कि दूर-दराज क्षेत्र में ऐसी ही घटनाएं होती हैं, लेकिन वह मुद्दा नहीं बनता। ऐसा हमने देखा भी। रविवार को ही नोएडा में एक साधारण परिवार की लड़की का शव मिला, जिसका बलात्‍कार करके हत्‍या की गई थी, लेकिन मीडिया उसे दामिनी कांड की तरह कवरेज नहीं दे सका, क्‍योंकि वह उतना वीभत्‍स, एलीट क्‍लास से संबंध रखने वाला और मिडिल क्‍लास को झकझोरने वाला नहीं था। क्‍या इससे किसी हत्‍या का अपराध या बलात्‍कार का दोष कमतर हो जाता है ? यदि नहीं तो नोएडा में युवती की बलात्‍कार के बाद हत्‍या का मुद्दा मीडिया के एजेंडे से बाहर क्‍यों रहा? दामिनी कांड के बाद पूरे भारत से बलात्‍कार की खबरें आईं, जिनमें से ज्‍यादातर घटनाओं का शिकार नाबालिग बच्चियां थीं। ये घटनाएं छोटे शहरों और गांवों की थीं। भागवत का बयान इन्‍हें नजरअंदाज करने वाला है।
मोहन भागवत का यह कहना कि ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरी क्षेत्रों में बलात्कार की घटनाएं ज्यादा होती हैं, कतई निराधार अवधारणा है। महिलाओं के प्रति हिंसा का ग्राफ गांवों में शहरों की अपेक्षा कतई कम नहीं है। हां, अंतर यह है कि शहरों की भागमभाग जीवनचर्या में घटनाएं ज्‍यादा हैं, घनी आबादी है, और पत्रकारिता का केंद्र शहरों तक सीमित है, इसलिए अखबार या चैनल की ज्‍यादातर खबरें गांवों से हो सकती हैं। यह ‘लुटियन पत्रकारिता’ के चलते है कि गांवों की घटनाएं हम तक नहीं पहुंचतीं।
जहां तक शहरी क्षेत्रों में संस्कार और परंपराओं अथवा मूल्‍यों के क्षरण की बात है, तो इसे दूसरे रूप में भी देखा जा सकता है कि पुरातन समय से चली आ रहीं तमाम रुढि़यों और परंपराओं को शहरी संस्‍कृति ने ध्‍वस्‍त कर दिया है। हममे में से ज्‍यादातर लोग उसे स्‍वीकार नहीं कर पा रहे हैं। महिलाएं मर्यादा में रहें, लक्ष्‍मण रेखा पार मत करें, कपड़े पर्याप्‍त पहनें, वे नग्‍न दिखें तो पुरुषों की क्‍या गलती- जैसे बयान बदलते समय को लेकर हमारी अस्‍वीकार्यता के नतीजे हैं। दिलचस्‍प तो यह है कि हमारी राजनीति से लेकर आम जनता में से ऐसी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। कितनी अजीब बात है कि आज के समय में हम अपनी बहुओं से दहेज में बड़ी रकम चाहते हैं, उनका नौकरीशुदा होना चाहते हैं और यह भी कहते हैं कि वे चहारदीवारी में रहें।
दिल्‍ली गैंगरेप की घटना के बाद बड़ी संख्‍या में नेताओं की प्रतिक्रिया हैरान करने वाली रही। मोहन भागवत का दुष्‍कर्म की घटनाओं के आधार पर देश को भारत और इंडिया में बांटना एकदम तर्कसंगत नहीं है। यह विभाजन कहीं से भी तर्कआधारित नहीं है, न तो आंकड़े के आधार पर, न ही सामाजिक व्‍यवहार के आधार पर। हमारी राजनीति नई सदी में भी बेहद अप्रगतिशील व्‍यवहार कर रही है। जड़ता इस हद तक कि उनका सारा ध्‍यान लड़कियों के पहनावे और कथित स्त्रियोचित मर्यादा पर ही केंद्रित है। एक दर्जन से अधिक नेताओं ने ऐसे बयान देकर इसकी पुष्टि की है।
एक बात जो गौर करने की है, वह यह कि सभी बयानवीरों में यह किसी ने आगे बढ़कर नहीं कहा कि हमारे समाज में पुरुषों को महिला के प्रति और अधिक उदार होने की जरूरत है। यह किसी ने नहीं कहा कि चार-चार साल की बच्चियों का बलात्‍कार समाज की संरचना पर गंभीर सवाल है और हमें इसमें आमूल परिवर्तन करने की जरूरत है। वही हजारों साल पुराना राग अलापा जा रहा है कि महिलाएं मर्यादा में रहें। यह एक पुरुषकेंद्रित समाज की स्‍वाभाविक सोच भर है और यकीनन अब इसके ध्‍वस्‍त होने का समय आ गया है।
केवल महिलाओं के पहनावे और पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव के कारण बलात्कार हो रहे होते तो सत्‍तर साल की बुढि़या और चार साल की बच्‍ची के बलात्‍कार नहीं होते। यह भी पुरुषों का अपने बचाव में एक शातिराना कुतर्क है। सबसे बड़ा प्रश्‍न यही है कि यह समाज जैसा हमने रचा है, उसकी अच्‍छाई बुराई को स्‍वीकारने की कूव्‍वत हममे है कि नहीं? मैं अभी जब यह लेख लिख रहा हूं, मेरे सामने एक खबर खुली है- मध्‍य प्रदेश के सतना के करौंदी गांव में एक बाप दस महीने से अपनी ही दो नाबालिग बच्चियों का बलात्‍कार कर रहा था। यह यकीनन अमेरिका के प्रभाव से नहीं हुआ। वह भारतीय गांव का एक बाप है। मोहन भागवत साहब! हमें ईमानदार आत्‍मावलोकन की जरूरत है। अपनी मादाओं के साथ जानवर भी ऐसा व्‍यवहार नहीं करते, जैसा हम अपनी मांओं, बहनों के साथ कर रहे हैं। कल आपने इंदौर में बदलाव का आह्वान किया था, वाकई हमारी सोच से लेकर समाज के ढांचे तक में बदलाव की दरकार है।

हाल ही में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने यौन हिंसा पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “रेप की घटनाएं भारत में कम इंडिया में ज्यादा होती हैं, क्योंकि वहां विदेशी सभ्यता का असर ज्यादा दिखाई देता है, आप देश के गांवों और जंगलों में देखें जहां कोई सामूहिक बलात्कार या यौन अपराध की घटनाएं नहीं होतीं। यह शहरी इलाकों में होते हैं। मोहन भागवत के इस बयान पर उनकी तीखी आलोचना हुई, जो कि स्‍वाभाविक ही थी क्‍योंकि अपराधी,  खास कर यौन हिंसा के मामले में, शहरी अथवा ग्रामीण परिवेश को देखते हुए अपराध को अंजाम नहीं देता।

इस मामले में सबसे गौर करने वाली बात यह है कि जिस दौरान दिल्‍ली में दामिनी कांड हुआ, उसके बाद पूरे देश से बलात्‍कार की अनगिनत खबरें आयीं, जिनमें से आधी से अधिक ग्रामीण इलाकों से थीं। क्‍योंकि हमने दिल्‍ली की घटना पर ही ज्‍यादा चर्चा की और बाकी को नजर अंदाज किया, इसलिए कोई कह सकता है कि यह दिल्‍ली में ही होता है। यह किसी घटना पर आंख मूंदकर अपने पूर्वग्रहों के आधार पर दी जाने वाली प्रतिक्रिया है।

अरुंधति राय समेत कई लोगों ने यह सवाल उठाया कि दूर-दराज क्षेत्र में ऐसी ही घटनाएं होती हैं, लेकिन वह मुद्दा नहीं बनता। ऐसा हमने देखा भी। रविवार को ही नोएडा में एक साधारण परिवार की लड़की का शव मिला, जिसका बलात्‍कार करके हत्‍या की गई थी, लेकिन मीडिया उसे दामिनी कांड की तरह कवरेज नहीं दे सका, क्‍योंकि वह उतना वीभत्‍स, एलीट क्‍लास से संबंध रखने वाला और मिडिल क्‍लास को झकझोरने वाला नहीं था। क्‍या इससे किसी हत्‍या का अपराध या बलात्‍कार का दोष कमतर हो जाता है ? यदि नहीं तो नोएडा में युवती की बलात्‍कार के बाद हत्‍या का मुद्दा मीडिया के एजेंडे से बाहर क्‍यों रहा? दामिनी कांड के बाद पूरे भारत से बलात्‍कार की खबरें आईं, जिनमें से ज्‍यादातर घटनाओं का शिकार नाबालिग बच्चियां थीं। ये घटनाएं छोटे शहरों और गांवों की थीं। भागवत का बयान इन्‍हें नजरअंदाज करने वाला है।

मोहन भागवत का यह कहना कि ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरी क्षेत्रों में बलात्कार की घटनाएं ज्यादा होती हैं, कतई निराधार अवधारणा है। महिलाओं के प्रति हिंसा का ग्राफ गांवों में शहरों की अपेक्षा कतई कम नहीं है। हां, अंतर यह है कि शहरों की भागमभाग जीवनचर्या में घटनाएं ज्‍यादा हैं, घनी आबादी है, और पत्रकारिता का केंद्र शहरों तक सीमित है, इसलिए अखबार या चैनल की ज्‍यादातर खबरें गांवों से हो सकती हैं। यह ‘लुटियन पत्रकारिता’ के चलते है कि गांवों की घटनाएं हम तक नहीं पहुंचतीं।

जहां तक शहरी क्षेत्रों में संस्कार और परंपराओं अथवा मूल्‍यों के क्षरण की बात है, तो इसे दूसरे रूप में भी देखा जा सकता है कि पुरातन समय से चली आ रहीं तमाम रुढि़यों और परंपराओं को शहरी संस्‍कृति ने ध्‍वस्‍त कर दिया है। हममे में से ज्‍यादातर लोग उसे स्‍वीकार नहीं कर पा रहे हैं। महिलाएं मर्यादा में रहें, लक्ष्‍मण रेखा पार मत करें, कपड़े पर्याप्‍त पहनें, वे नग्‍न दिखें तो पुरुषों की क्‍या गलती- जैसे बयान बदलते समय को लेकर हमारी अस्‍वीकार्यता के नतीजे हैं। दिलचस्‍प तो यह है कि हमारी राजनीति से लेकर आम जनता में से ऐसी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। कितनी अजीब बात है कि आज के समय में हम अपनी बहुओं से दहेज में बड़ी रकम चाहते हैं, उनका नौकरीशुदा होना चाहते हैं और यह भी कहते हैं कि वे चहारदीवारी में रहें।

दिल्‍ली गैंगरेप की घटना के बाद बड़ी संख्‍या में नेताओं की प्रतिक्रिया हैरान करने वाली रही। मोहन भागवत का दुष्‍कर्म की घटनाओं के आधार पर देश को भारत और इंडिया में बांटना एकदम तर्कसंगत नहीं है। यह विभाजन कहीं से भी तर्कआधारित नहीं है, न तो आंकड़े के आधार पर, न ही सामाजिक व्‍यवहार के आधार पर। हमारी राजनीति नई सदी में भी बेहद अप्रगतिशील व्‍यवहार कर रही है। जड़ता इस हद तक कि उनका सारा ध्‍यान लड़कियों के पहनावे और कथित स्त्रियोचित मर्यादा पर ही केंद्रित है। एक दर्जन से अधिक नेताओं ने ऐसे बयान देकर इसकी पुष्टि की है।

एक बात जो गौर करने की है, वह यह कि सभी बयानवीरों में यह किसी ने आगे बढ़कर नहीं कहा कि हमारे समाज में पुरुषों को महिला के प्रति और अधिक उदार होने की जरूरत है। यह किसी ने नहीं कहा कि चार-चार साल की बच्चियों का बलात्‍कार समाज की संरचना पर गंभीर सवाल है और हमें इसमें आमूल परिवर्तन करने की जरूरत है। वही हजारों साल पुराना राग अलापा जा रहा है कि महिलाएं मर्यादा में रहें। यह एक पुरुषकेंद्रित समाज की स्‍वाभाविक सोच भर है और यकीनन अब इसके ध्‍वस्‍त होने का समय आ गया है।

केवल महिलाओं के पहनावे और पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव के कारण बलात्कार हो रहे होते तो सत्‍तर साल की बुढि़या और चार साल की बच्‍ची के बलात्‍कार नहीं होते। यह भी पुरुषों का अपने बचाव में एक शातिराना कुतर्क है। सबसे बड़ा प्रश्‍न यही है कि यह समाज जैसा हमने रचा है, उसकी अच्‍छाई बुराई को स्‍वीकारने की कूव्‍वत हममे है कि नहीं? मैं अभी जब यह लेख लिख रहा हूं, मेरे सामने एक खबर खुली है- मध्‍य प्रदेश के सतना के करौंदी गांव में एक बाप दस महीने से अपनी ही दो नाबालिग बच्चियों का बलात्‍कार कर रहा था। यह यकीनन अमेरिका के प्रभाव से नहीं हुआ। वह भारतीय गांव का एक बाप है। मोहन भागवत साहब! हमें ईमानदार आत्‍मावलोकन की जरूरत है। अपनी मादाओं के साथ जानवर भी ऐसा व्‍यवहार नहीं करते, जैसा हम अपनी मांओं, बहनों के साथ कर रहे हैं। कल आपने इंदौर में बदलाव का आह्वान किया था, वाकई हमारी सोच से लेकर समाज के ढांचे तक में बदलाव की दरकार है।

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