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राहुल गांधी की यात्राओं का हासिल

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हाल ही में कश्मीर से पंचायत प्रतिनिधियों का विरोध झेल कर लौटे राहुल को पंजाब में भी युवाओं का विरोध झेलना पड़ा। हालांकि, पंजाब विश्वविद्यालय में राहुल युवाओं के राजनीति में आने और उसे साफ-सुथरा बनाने का आह्वान कर रहे थे, लेकिन बात बनने की जगह बिगड़ गई। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि पंजाब में मानव संसाधन का क्या हो रहा है? दस में से सात युवक नशा करते हैं। आप लोग राजनीति में आकर बदलाव की शुरुआत करें। उनके इस आह्वान का कोई असर हुआ या नहीं, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन उनका यह दांव जरूर उल्टा पड़ गया। सत्ताधारी अकाली सरकार और अन्य संगठन उन पर बिफर गए कि वे युवाओं को नशेड़ी बता रहे हैं। उन्हें तथ्यों की कोई जानकारी नहीं है। विश्वविद्यालय में आयोजित उनके कार्यक्रम का भी विरोध हुआ कि विश्वविद्यालय परिसर का इस तरह राजनीतिक इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।
राहुल गांधी की कश्मीर और पंजाब की यात्रा के मद्देनजर यदि पड़ताल की जाए तो कुछ सवाल उठते हैं। कश्मीर में आतंकियों से खौफ खाए पंचायत प्रतिनिधियों को राहुल गांधी से उम्मीदें थीं कि वे पंचों पर हो रहे आतंकी हमले को लेकर कोई ठोस पहल करेंगे। लेकिन उन्होंने मौन धारण कर उन उम्मीदों को धराशायी कर दिया। राहुल गांधी ने पंच-सरपंचों की सुरक्षा के मसले पर एक शब्द भी नहीं कहा, न ही पंचायती सुधारों के बारे में। जबकि सरपंचों पर आतंकी हमले और इसके चलते उनके इस्तीफे फिलहाल कश्मीर की सबसे बड़ी समस्या है। इस मसले को राहुल गांधी ने राज्य सरकार के पाले में डालकर पल्ला झाड़ लिया। राहुल गांधी के कश्मीर पहुंचने से पहले तक माना जा रहा था उनके एजेंडे में पहली प्राथमिकता पर यही मुद्दा होगा। क्योंकि स्थितियां मौन रहने लायक नहीं हैं।
जनवरी, 2012 से अब तक कश्मीर में करीब आठ सौ पंचायत प्रतिनिधि आतंकियों की धमकी के चलते अपना पद छोड़ चुके हैं और करीब एक दर्जन प्रतिनिधियों की फरमान नहीं मानने पर आतंकियों ने हत्या कर दी है। इसी खौफ से घाटी के पंचायत प्रतिनिधि बाकायदा अखबारों में इश्तिहार देकर या फिर मस्जिद में सार्वजनिक तौर पर माफी मांग कर अपने पद छोडऩे का एलान कर रहे हैं। अंतत: कांग्रेस पार्टी से ही जुड़े पंच-सरपंचों ने नारेबाजी करके राहुल गांधी के प्रति अपने गुस्से का इजहार किया। यदि इस मुद्दे पर उन्होंने कुछ नहीं कहा तो सवाल यह उठता है कि उनकी कश्मीर यात्रा का मकसद क्या रहा और हासिल क्या हुआ?
कश्मीर की मौजूदा पेचीदगियों के बरक्स कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की इस यात्रा की पड़ताल जरूरी है कि उनका दौरा सही अर्थों में कश्मीर समस्या को हल करने की दिशा में कितना मददगार साबित होगा। राहुल कुछ जाने माने उद्योगपतियों के साथ कश्मीर की दो दिवसीय यात्रा पर गए और कश्मीर विश्वविद्यालय के छात्रों से संवाद किया। उन्होंने कश्मीरियों से एक भावुक रिश्ता जोडऩे की कोशिश करते हुए कहा है कि मैं भी एक कश्मीरी हूं और आप लोगों के साथ मिलकर आपकी मुश्किलें हल करना चाहता हूं। मैं कश्मीरियों से आजीवन संबंध बनाए रखना चाहता हूं, जिस तरह मेरे नाना जवाहरलाल नेहरू ने दादा शेख अब्दुल्ला के साथ मिलकर काम किया था, मैं भी मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के साथ मिलकर काम करना चाहता हूं।
हालांकि, यह तथ्य सर्वविदित है कि खुद राहुल गांधी की कांग्रेस पार्टी और कश्मीर में गठबंधन सहयोगी नेशनल कांफ्रेंस के अलावा राहुल गांधी के इस दावे पर कोई विश्वास नहीं करेगा। ठीक वैसे ही, जैसे उत्तर प्रदेश समेत बाकी राज्यों के युवाओं ने, या कहें समस्त जनता ने उन पर अब तक उनपर विश्वास नहीं जताया है।
उनकी कश्मीर यात्रा के दौरान एक एक गौरतलब बात यह रही कि जानेमाने उद्योगपति रतन टाटा कश्मीरी छात्रों से बातचीत करके बहुत उत्साहित दिखे। उनके मुताबिक, राहुल गांधी ने कश्मीर में नई रोशनी के लिए सिर्फ खिड़की ही नहीं, बल्कि दरवाजा खोल दिया है। उन्होंने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से कश्मीर में उद्योग लगाने पर चर्चा भी की। राहुल के साथ रतन टाटा के अलावा कुछ और बड़े उद्योगपति थे। यदि इस पहल पर कायदे से अमल होता है तो निश्चित ही कश्मीर की तस्वीर कुछ बदलेंगी और इसका श्रेय राहुल गांधी को जाएगा। क्योंकि कश्मीर में उद्योगों की शुरुआत बेकारी से जूझ रहे युवाओं को रोजगार मुहैया कराएगी और वे कुछ हद तक अलगापववादी गतिविधियों से दूर हो सकेंगे।
लेकिन यह कश्मीरी जनता के एक हिस्से के बारे में ही सच है। कश्मीर की मौजूदा परिस्थियां इतनी सामान्य नहीं हैं जितना कि सरकारें दावा कर रही हैं। कश्मीर की वादियां लंबे समय से किसी न किसी बहाने लगातार अशांत बनी हुई हैं। चाहे वह 2008 की अमरनाथ यात्रा का बहाना हो, शोपियां में युवतियों की हत्या का मामला हो, सूफी दरगाहों में आगजनी की घटनाएं हों या फिर इस्लाम विरोधी अमेरिकी फिल्म का मामला हो। घाटी के किसी न किसी हिस्से में हमेशा अशांति बनी रहती है। सड़कों पर उतरकर पत्थरबाजी और प्रदर्शन करने वाला भी वही युवा वर्ग है, जिसे राहुल गांधी उद्योगों के बहाने मुख्यधारा में लाने की बात कर रहे हैं। अलगाववादी तत्वों द्वारा इन युवाओं में यह बात कूट कूट कर भरी जा रही है कि भारत एक अलग देश है जो उन पर शासन कर रहा है। राहुल गांधी की यात्रा के दौरान भी युवाओं का एक गुट राहुल गांधी वापस जाओ के नारे लगाकर पाकिस्तानी राष्ट्रगान गा रहा था। राहुल गांधी और उमर अब्दुल्ला सहित पूरे देश के सामने यह चुनौती है कि कश्मीरी युवा को समझाकर यह बात मनवाई जाय कि यह देश उनका है। कश्मीरी युवाओं की हर क्षेत्र में समुचित भागीदारी ही इसका हल हो सकती है।
जानकार यह बात जानते और मानते हैं कि राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी का यह सारा उपक्रम आगामी लोकसभा चुनाव के लिए उन्हें बतौर प्रधानमंत्री उम्मीदवार प्रोजेक्ट करना है। उनके कश्मीर दौरे के दौरान फारूक अब्दुल्ला ने यह कहा भी कि वह दिन दूर नहीं, जब राहुल देश के प्रधानमंत्री बनेंगे। यह वह तथ्य जिसे जनता को बताने के लिए राहुल गांधी की हर यात्रा का आयोजन होता है। वरना, कश्मीर की समस्याओं के बीच इस घोषणा का कोई अर्थ नहीं रह जाता। कश्मीर सहित देश की जनता यह जानती है कि राहुल गांधी जो भी काम करते हैं वह देश को आगे ले जाने वाले एक नेता के रूप में नहीं, बल्कि भावी प्रधानमंत्री के रूप में अपने लिए समर्थन मांगने के लिए करते हैं। गरीब ग्रामीणों की झुग्गियों में खाना खाने और ठहरने से लेकर कश्मीर या पंजाब के दौरे इसी उपक्रम का हिस्सा हैं। हाल ही में एतिहासिक उथल-पुथल से ग्रस्त हुए असम में भी राहुल या उनकी पार्टी ने कोई उल्लेखनीय भूमिका नहीं निभायी। राहुल ने का दौरा तब किया, जब सारा बवंडर थम चुका था। कश्मीर यात्रा का भी मकसद सोनमर्ग में जोजिला सुरंग की नींव का पत्थर रख उसका श्रेय केंद्र और कांग्रेस पार्टी को दिलाना था।
आखिरश लब्बोलुआब यह कि राहुल के हालिया सभी दौरे नाकाम साबित हुए। उनके सामने जिस तरह की जन प्रतिक्रियाएं सामने आईं, उससे साफ है कि राहुल गांधी को यदि युवा भारत का नेता बनना है तो पार्टी हितों से ऊपर उठकर जनता को विश्वास में लेना होगा कि वे वाकई जनता की सेवा करना चाहते हैं।
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