blogid : 8844 postid : 58

मैं दोषी नहीं था

Posted On: 29 Oct, 2012 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

पहली बार जब मैं जेल गया
मेरे हाथों में
एक खिलौने का डब्बा था
उसमें कुछ कंचे थे
गली में पड़ा मिला
एक जंग खाया चाकू था
कुछ बिजली के फ्यूज हुए तार थे
और तब मैं यह भी नहीं जानता था
कि आतंकवादी होने का मतलब क्या होता है

दूसरी बार जब जेल गया
तो मैं कुछ बड़ा हो गया था
और एक अजीज दोस्त से
बतिया रहा था
एक नक्सली की पुलिसिया हत्या के बाद
अखबार में छपी खबर और तस्वीर के बारे में
तब मैं नहीं जानता था नक्सली होने का मतलब
और यह भी नहीं कि नक्सली शब्द उचारना,
जबान पर लाना कोई जुर्म है

तीसरी बार जब जेल गया
तब मैने बिल्कुल नहीं जाना
कि मैं जेल क्यों गया
इतना मालूम चला था अखबारों से
कि उनका प्रचार कामयाब हुआ
और पूरा देश घृणा करने लगा है मुझसे

हालांकि, जेल में मिलने आती
अपनी नन्ही बच्ची की आंखों में
मैं देख लिया करता था अपना चेहरा
उसकी आंखें बोलती थीं
मैं दोषी नहीं था



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (9 votes, average: 4.44 out of 5)
Loading ... Loading ...

9 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

graceluv के द्वारा
March 11, 2013

Hello Dear! My name is Grace, I saw your profile and would like to get in touch with you If you’re interested in me too then please send me a message as quickly as possible. (gracevaye22@hotmail.com) Greetings Grace

Sushma Gupta के द्वारा
October 30, 2012

प्रिये कृष्णकांत जी, आपकी सार्थक एवं सटीक रचना समाज के उस तथ्य को उजागर करने में पूर्ण सक्षम है जिसके कारण कितने ही निर्दोष एवं मासूम लोगों को भी जेल और अन्य यातनाये भुगतनी पड़ती हैं |

    krishnakant के द्वारा
    October 31, 2012

    शुक्रिया जी…

rahulpriyadarshi के द्वारा
October 30, 2012

संवेदनशील रचना,हर इंसान की अपनी कहानी होती है,जिसे जाने बगैर उसके बारे में कोई राय बनाना सिर्फ हमारी बुद्धि पर निर्भर करता है,उसके व्यक्तित्व पर नहीं.आपने उनकी जगह पर खुद को रखा है,और भावों को उकेरने में सफल हुए हैं,उत्तम.साधुवाद :)

    krishnakant के द्वारा
    October 30, 2012

    आत्मिक धन्‍यवाद राहुलजी… :-)

deepasingh के द्वारा
October 30, 2012

वन्देमातरम कृष्णकांत जी. मर्मस्पर्शी संवेदनशील काव्य के लिए बधाई.मेरे ब्लॉगपर भी जाएं.धन्यवाद.

    krishnakant के द्वारा
    October 30, 2012

    दीपाजी, शुक्रिया.. जरूर देखूंगा.

Santlal Karun के द्वारा
October 29, 2012

“तीसरी बार जब जेल गया तब मैने बिल्कुल नहीं जाना कि मैं जेल क्यों गया इतना मालूम चला था अखबारों से कि उनका प्रचार कामयाब हुआ और पूरा देश घृणा करने लगा है मुझसे |” संवेदनात्मक उत्कृष्ट कविता; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

yatindranathchaturvedi के द्वारा
October 29, 2012

बधाई। स्वागत है।


topic of the week



latest from jagran