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पीड़ा यह न जाने कैसी

Posted On: 27 Jun, 2012 Others में

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पीड़ा यह न जाने कैसी
रग-रग में यूं दौड़ रही है
रोम-रोम दुखता है जैसे
कोई खंजर घोंप रहा हो
बरसों का प्यासा वजूद ज्यों
कतरा-कतरा बीत रहा हो

क्या छूटा है, क्या टूटा है
भीतर-भीतर क्या उट्ठा है
बोझिल सांसें डूब रही हैं
सब वजूद रह-रह दुखता है

जो खोया है वो लौटा दो
मेरा चांद कहीं से ला दो
कौन सी मेरी राहगुज़र है
किधर चलूं मैं, यह बतला दो
कहां गए तुम सब कुछ लेकर
मेरे हमनफस, मेरे रहबर
मेरा दामन फिर महका दो
जिन सांसों से लदा हुआ था
मुझ पर वो फिर से बिखरा दो
ख़ाली-ख़ाली दामन में फिर
ख्वाबों की लड़ियां पहना दो

पीड़ा यह न जाने कैसी
रग-रग में यूं दौड़ रही है…



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bdsingh के द्वारा
August 25, 2013

बहुत सुन्दर रचना 

Ravinder kumar के द्वारा
June 27, 2012

कृष्णकान्त जी, नमस्कार. आप के शब्दों में बहुत कुछ पीछे छूट जाने की पीड़ा स्पष्ट झलकती है. इसी छूटे हुए को फिर से पाने की छटपटाहट साफ़ दिखाई देती है- ख़ाली-ख़ाली दामन में फिर, ख्वाबों की लड़ियां पहना दो. श्रीमान जी, मन के उद्वेलन को दिखाती सुंदर रचना के लिए बधाई और भविष्य के लिए शुभकामनाएं. नमस्ते जी.


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